और एक नई पार्टी क्यों? -

देश में करीब करीब ७ राष्ट्रीय और ५० से ऊपर राज्यस्तर पर पक्ष रजिस्टर है। आप के मन मे सवाल आना उचित है की, देश में और एक पार्टी की क्या जरुरत है? हम ७२ साल से देखते आ रहे है और आज भी देख रहे है, मौजूदा पक्ष देशहित का कोई काम नहीं कर रहे है। सरकार और विरोधी पक्ष मिल-जुलकर भ्रष्टाचार कर रहे है। सभी का ध्येय सत्ता में आकर पैसा कमाना और पैसों से सत्ता हासिल करना बन चूका है।

जब भी चुनाव हुये हमने सोचा ये पार्टी भ्रष्ट है तो दूसरे पार्टी को वोट दिया, जब दूसरे पार्टी ने भ्रष्टाचार किया तो हमने तीसरा विकल्प ढूंढा और इसी तरह ७२ साल बीत गए। सभी पार्टियो ने देश और देशवासियों की जरूरतों को नजर अंदाज किया, पार्टियों ने अपनी गरिमा खो दी। वोटर उदासीन होता गया। वोटर्स को अपनी तरफ खींचने के लिए, उन्हें रिझाने के लिए जात-धर्म, मुफ़्त की योजनाए, आरक्षण, झूठे वादे, पैसों से वोट खरीदना, गिफ्ट बाँटना एैसे... हथखंडे आजमाना शुरू हुये और देश जनतंत्र की राह से भटक गया....

हमारे संविधान में अंतर्भूत जनतंत्र, धर्म निरपेक्षता, राष्ट्रिय एकात्मता जैसे आधारभूत तत्वों के प्रति कोई भी पार्टी गंभीर नजर नहीं आती। नाम के लिए धर्म निरपेक्षता है। हमारे पारंपारिक विचारधारा का फायदा लेकर कुछ पार्टिया जात-धर्म, भाषा, प्रांत, जैसे मुद्दों को उछालकर हमें आपस में लढवाया जा रहा है। आपस में बांटा जा रहा है ।

इसी वजह से जात-जात, धर्म-धर्म एवं प्रांतो में दरारे पैदा हो रही है। जनता मैं असंतोष बढ़ रहा है। देश की शांतिम, एकता और अखंडता को खतरा पैदा हो रहा है। संघर्ष की शरुवात हो चुकी है। देश में जनतंत्र सिर्फ नाम के लिए बचा है। अब मतदाता उदासीन हो गया है। लोगों ने वोटिंग करना बंद कर दिया है। कुछ बचे हुवे मतदाता है जो जनतंत्र के उद्देश्य से परे है। वे अपने वोट बेचने लगे है। सभा और रैलीयो के लिए लोग किराये पर लाना शुरू हुवा है , अब तो EVM मशीन की मैनेज किये जाने की खबरे बार - बार आ रही है ...

लोगों का जनतंत्र से विश्वास उठ गया है। जनतंत्र ख़त्म होने की राह पर है। हमारे देश मै क्या ठीक है?

"शिक्षा व्यवस्था" कहा जाता है की किसी देश को ख़त्म करना है, तो वहा की शिक्षा व्यवस्था को खत्म कर दो । यही हो रहा है हमारे देश मै... शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह खोकली कर दी गयी है। सरकारी स्कूल को बीमार बनाकर निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है । शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह व्यापार का स्वरूप आ चूका है। ज्यादातर स्कूल और कॉलेजेस नेताओं की है। डोनेशन के नामपर छात्रों को लुटा जा रहा है । गरीबों के बच्चे जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते है, वहा शिक्षा का सिर्फ देखावा है। आठवीं कक्षा तक छात्रों को पास किया जाता है। इसलिए बच्चों को ध्यान देकर पढ़ने की जरुरत महसूस नहीं होती। छात्रों की बुद्धि का विकास थम जाता है। फिर कुछ नववी और कुछ दसवीं कक्षा में फेल हो जाते है । बचे कुछ बारवी में फेल हो ही जाते है । इसतरह बच्चे नौकरी के काबील नहीं बन पा रहे है। मजदुर बन रहे है... Exam में रैंकिंग बंद कर दिया है। छात्रोंको बिना मेहनत मार्क्स देकर पासिंग की व्यवस्था की गयी है। लेकिन स्पर्धात्मक विकास को ख़त्म कर दिया गया है...ऐसे माहौल में पढाई सिर्फ एक सर्टिफिकेट और नौकरी खातिर हो रही है, ज्ञान के लिए नहीं ।

जनसंख्या बेशुमार बढ़ रही है। देश में चुनाव धार्मिक आधार पर लड़े जाते है...सत्ता में आना है, तो धर्म की संख्या ज्यादा होना जरुरी है.. सत्ता में आने के लिए, अपने धर्म का प्रभाव बढ़ाने के लिए, कुछ लोग दो से ज्यादा बच्चो को जन्म दे रहे है। भविष्य मै अन्न, वस्त्र, निवारा, पानी, बिजली, शिक्षा, ईंधन, नौकरियां ऐसी मुलभुत जरूरतों को पूरी करना मुश्किल हो जायेगा। सामाजिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है ।

पुलिस, नेता और गुनहगारों की सांठ-गांठ है। सभी एक दूसरे को मदत कर रहे है। मिलजुल कर काम किया जा रहा है और आम आदमी का सभी रास्तों से शोषण किया जा रहा है । न्याय व्यवस्था पूरी तरह खोकली हो चुकी है। न्याय पाने के लिए सालो लग जाते है। अगर वैवाहिक संबंध में किसी कारण वश दरार आ जाये तो जवानी में माँगा गया तलाक बुढ़ापे में मिल रहा है। सिवील मैटर में तो तीसरी पीढ़ी को रिजल्ट मिल रहा है। न्याय व्यवस्था एक मजाक बन गया है। न्याय व्यवस्था से लोगों का विश्वास उड़ गया है।

हमारे देश में ८० प्रतिशत लोगों का व्यवसाय खेती है। लेकिन किसानो के सुख सुविधा और समस्याओं को नजर अंदाज किया जा रहा है। फसले आते ही दाम घटाए जाते है। निर्यात धोरण ना होने से मजबूरन किसानो को घाटे में माल बेचना पड़ता है। दिनबदिन किसानो को लागत से कम कमाई हो रही है। नतीजा किसान रोजाना खुदखुशी कर रहे है ।

आज तक की सरकार और नेताओं ने परदेशी कंपनियां तथा बाहर देशो को हमारे देश में व्यापार करने की अनुमति दे रखी है। इस कारण हमारे स्वदेशी उद्योग , उत्पादन तथा व्यवसाय ख़त्म हो चुके है। छोटे छोटे उद्योग भी GST की झपट में आकर दम तोड़ चुके है। देश में बेरोजगारी बुरी तरह बढ़ गयी है। हमारी देश की अर्थ व्यवस्था से काफी बड़ा हिस्सा परदेशो में में जा रहा है। अर्थ व्यवस्था खोकली हो रही है । अर्थ व्यवस्था की खस्ता हालत को देखते हुवे सरकारी नौकरियों में रिक्ते पदों की भर्ती बंद कर दी गयी है । रोजगार ना होना देश की की सबसे बड़ी समस्या बन रही है । सरकार किसानो का नहीं बल्कि बड़े व्यापारियों का कर्जा माफ़ कर रही है। कुछ लोग हजारो करोड़ के कर्ज लेकर देश से भाग रहे है। राफेल जैसे डील ज्यादा आंकड़े दिखा कर देश को लुटा जा रहा है। बुलेट ट्रेन के लिए लाखो करोडो के कर्जे देश के सिरपर बिठाये जा रहे है। ये सभी भ्रष्टाचार के रास्ते है। देश को बुरी तरह लुटा जा रहा है ।

मिलावट, प्रदुषण और अन्य कई कारणों से बीमारियां बढ़ गयी है। सरकारी अस्पतालों में दवाइयां की कमी, डॉक्टर और स्टाफ की कमी, आधुनिक इक्विपमेंट की कमी है... लोगों की आधी उम्र में ही मृत्यु हो रही है ।लेकिन मौजूदा व्यवस्था का इस तरफ ध्यान नहीं है। आज तक के सभी दलों की सरकारने टैक्स के खातिर गुटखा, शराब, लॉटरी, नशीले पदार्थ, धूम्रपान को बढ़ावा दिया है। युवा पीढ़ी को मानसिक, शारिरिक तथा आर्थिक स्तरपर खोकला किया जा रहा है। आरोग्य के लिए हानिकारक गुटखा, सिगारेट, शराब बनाने और बेचने की अनुमति भी सरकार दे रही है और ये चीजे स्वास्थ के लिए हानिकारक है ये बतानेवाली विज्ञानपर करोड़ों का खर्चा भी सरकार कर रही है और ऐसे हानिकारक पदार्थ के सेवन से होनेवाली बिमारियों के इलाज के लिए अस्पताल भी सरकार चला रही है। सब कुछ आश्चर्यकारक और अदभुत है ।

देश में टैक्स के जरिये जमापूंजी को शिक्षा आरोग्य, जीवनावश्यक जगह पर नहीं बल्कि वोटों के खातिर मुफ्त की योजनाओं पर ज्यादा खर्चा किया जा रहा है । सारे पक्ष-विवक्ष मिलजुलकर काम कर रहे है। चंद बड़े व्यापारियों से चुनाव के लिए पैसा लेकर बदले में व्यापर के नामपर भारतीय जनता को लुट ने के लाइसेंस दिए जा रहे है । महंगाई पर किसी का अंकुश नहीं है ।भ्रष्टा0चार से कमाई दौलत को विदेशों में रखा जा रहा है। सरकारने जनता को लूटने के लिए कई प्रकार के नए टैक्स लागु कर दिए है। आम लोगों को गुजारा करना मुश्किल हो गया है ।

जो - जो पार्टिया सत्ता में आ रही है- वो एक एक व्यवस्था का निजीकरण कर रही है। क्यों की इसमें वन टाइम डील होता है। सरकार में बैठे नेताओं का फायदा होता है। जनता और देश में आने वाले कल की समस्याओं को नजर अंदाज किया जा रहा है। राष्ट्रिय तथा आंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेले जाने वाले खेलो का व्यवस्थापन, ज्येष्ठ खिलाडियों के हातों में होना चाहिए लेकिन । इस क्षेत्र में भी राजकीय हस्तक्षेप है। नेताओं का कब्ज़ा है। पुरे देश में सिर्फ क्रिकेट को बढ़ावा दिया जा रहा है, क्यों की इसमें पैसा है बाकि खेल नामशेष होने को है । खेल विभाग मैं राजकीय तथा आर्थिक स्वार्थ के होते हुवे खिलाडियों चयन आर्थिक लेन देन पर निर्भर होता है। गरीब होनहार खिलाडियों को मौका नहीं मिलता। परिणामत: खेलो मे आंतरराष्ट्रीय स्तरपर देश कुछ खास करता हुवा नजर नहीं आ रहा है ।

पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण कार्य की तरफ किसी का ध्यान नहीं । बढ़ता हुवा तापमान, बारिश का न होना, प्रदुषण उग्ररूप धारण कर रहा है । इस कारन कई प्रकार की समस्या निर्माण हो रही है । बीमारियां बढ़ रही है। मौते हो रही है। स्त्री सुरक्षा चिंता का विषय बन चूका है। आये दिन बलात्कार हो रहे है । जात - धर्म के नामपर लोग रोजाना रस्तेपर उतर रहे है। एक दूसरे को मारने मरने पर तुले है । लोगों को देश का नहीं अपनी जात धर्म का अभिमान है । नक्षलवाद, आतांकवाद देश को ललकार रहा है। सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार के बिना काम आगे बढ़ता नहीं । नगर निगम भ्रष्टाचार का दरिया बन चूका है ।

भगवान के नाम पर समाज को गुमराह किया जा रहा है। जात धर्मपर आधारित राजनीती हो रही है । मीडिया ख़रीदा और बेचा जा रहा है। देश बहोत ही गंभीर अवस्था से गुजर रहा है । हमारे देश में कोई अनपढ़ अज्ञानी, अशिक्षित है कोई जाती वादी, धर्म वादी, प्रांत वादी, भाषा वादी है । कोई गरीब लाचार, डरपोक, बेरोजगार, व्यसनाधीन, निराश, चेतनाहीन है । कोई भाग्यवादी, ईश्वर वादी या स्वार्थी है लेकिन सबमे एक बात सामान है, हर एक को अपने अपने घर की पड़ी है । सिर्फ अपने ही धर्म का अभिमान है । देश से किसी को कुछ लेना देना नहीं है। राष्ट्रिय संपत्ति से देशवासियों को वास्ता नहीं है और इन्ही वजह से चंद नेताओ ने देश को तमाशा बना रखा है । कानून के दायरे में रहकर देशवासियों को राष्ट्रिय संपत्ति को, पुरे देश को लूटने को सिस्टम डेवलप कर रखा है कोई किसी को विरोध नहीं करता है ।

सत्ताधारी भी लूट रहे है... विपक्ष भी लूट रहे है। सभी राजकीय पार्टियों को इंटेंशन देश को संभालना सुधार लाना, देश को प्रगति की उच्चतम सीमापर ले जाना, आंतरराष्ट्रीय स्तर एक मुकाम बनाना नहीं, बल्कि खुद को और पार्टी को धनवान बनाना है । यु समझो की देश चक्रव्यूह में फंस चूका है । क्या ठीक है हमारे देश में? कुछ भी नहीं...

इसलिए एक नए पार्टी की जरुरत है। उपरोक्त समस्या और प्रणाली को बदलना जरुरी है। यही भारत विज़न लेकर पार्टी ऑफ़ यूनाइटेड इंडियन्स बनी है । हमें प्रभुता, समता, समानता, एकता और अखंडता की और ध्यान देना जरुरी हो गया है ।

देश चंद लुटारू नेताओं के चुंगल में फस गया है। ऐसे नेताओ की चुंगल से देश बचाना होगा। देश को फिर से आज़ाद करना जरुरी हो गया है ।

अभी क्रांति नहीं हुवी, बदलाव नहीं आया...

राजनीती, सत्ता और प्रणाली में परिवर्तन नहीं हुवा, तो अनर्थ हो जायेगा। देश में असंतोष फ़ैल रहा है ये देश की अखंडता के लिए ठीक नहीं है।


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